रविवार, 10 अक्टूबर 2010

आप किस तरह प्रदूषण की रोकथाम कर सकते हैं






ध्वनि प्रदूषण से बचने के लिए

  1. घर में टी.वी., संगीत संसाधनों की आवाज धीमी रखें।
  2. कार का हार्न अनावश्यक न बजायें।
  3. लाउड स्पीकर का प्रयोग न करें।
  4. शादी विवाह में बैंड-बाजे-पटाखे आदि व्यवहार में न लाऐं।
  5. ध्वनि प्रदूषण सम्बन्धी सभी कानूनों का पालन करें।

वायु प्रदूषण से बचने के लिए

  1. घर, फैक्ट्री, वाहन के धुँए को सीमा में रखें।
  2. पटाखों का इस्तेमाल न करें।
  3. कूड़ा-कचरा जलाऐं नहीं, नियत स्थान पर डालें।
  4. जरूरी हो तो थूकने के लिए बहती नालियों या थूकदान का इस्तेमाल करें।
  5. वायु प्रदूषण सम्बन्धी सभी कानूनों का पालन करें।

जल प्रदूषण से बचने के लिए

  1. नालों-कुओं-तालाबों-नदियों में गन्दगी न करें।
  2. सार्वजनिक जल वितरण के साथ छेड़छाड़ न करें।
  3. विसर्जन नियत स्थान पर ही करें।
  4. पानी की एक भी बूँद बर्बाद न करें।
  5. जल प्रदूषण सम्बन्धी सभी कानूनों का पालन करें।

रासायनिक प्रदूषण से बचने के लिए

  1. रासायनिक की जगह जैविक खाद, प्लास्टिक की जगह कागज, पोलिस्टर की जगह सूती कपड़े या जूट आदि का इस्तेमाल करें।
  2. प्लास्टिक की थैलियाँ आदि रास्ते में न फेंकें।
  3. ज्यादा से ज्यादा पेड़-पौधे, हरियाली लगायें।
  4. रसायन सम्बन्धी सभी कानूनों का पालन करें।

शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

नर्मदा-ताप्ती को प्रदूषण से खतरा

औद्योगिक पट्टी कर रही है पुण्यनीरा नदियों कासत्यानाश

सचिन शर्मा
मध्यप्रदेश की औद्योगिक पट्टी इंदौर क्षेत्र में बहने वाली नर्मदा और ताप्ती नदियों को औद्योगिक प्रदूषण से बेहद खतरा है। यह खतरा मुख्यतः क्षेत्र के पाँच जिलों इंदौर, खण्डवा, खरगौन, बुरहानपुर और बड़वानी में स्थित लगभग १२०० छोटी औद्योगिक इकाइयों से है जो कंजूसी में प्रदूषण नियंत्रण के मानकों की परवाह नहीं करतीं और क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड उन्हें यह काम करने से रोक भी नहीं पाता। इस प्रदूषण से उक्त दोनों अमूल्य नदियों में धीरे-धीरे जहर घुल रहा है।
इंदौर क्षेत्र में लगभग १३०० छोटी, बड़ी और मझोली औद्योगिक इकाइयाँ हैं। इनमें से बड़ी और मझोली इकाइयों की संख्या ७० है जबकि छोटी इकाइयां लगभग १२०० हैं। केन्द्र सरकार ने जल प्रदूषण रोकने के लिए १९७४ में जल प्रदूषण नियंत्रण कानून बनाया था जिसके तहत जीरो डिस्चार्ज के नियम का पालन होना था। लेकिन इन नियम का पालन उक्त इकाइयों में से सिर्फ बड़ी और मझोली यानी कुल ७० इकाइयां ही कर पाती हैं। छोटी औद्योगिक इकाइयां इस कानून की बराबर अनदेखी करती रहती हैं। इसका सबसे ज्यादा नुकसान बुरहानपुर और नेपानगर से बहकर गुजरने वाली ताप्ती नदी को होता है क्योंकि बुरहानपुर जिले में कॉटन प्रोसेसिंग और जीनींग औद्योगिक इकाइयां हैं जहां पानी का सबसे ज्यादा प्रदूषण होता है। नर्मदा भी धीरे-धीरे औद्योगिक जहर का शिकार हो रही है जबकि इसका पानी तो इंदौर में पीने के लिए सप्लाई किया जाता है। बड़वाह स्थित शराब कारखानों से नर्मदा को सबसे अधिक प्रदूषण का खतरा है।

क्या है जीरो डिस्चार्ज..?
जीरो डिस्चार्ज के तहत औद्योगिक इकाई को इस्तेमाल किए प्रदूषित पानी को बाहर निकालने के बजाए वापस अपने इस्तेमाल में लेना होता है। इससे प्रदूषित पानी प्राकृतिक स्त्रोत से नहीं मिल पाता है तथा उद्योग द्वारा स्वच्छ पानी के इस्तेमाल में भी कमी आती है। छोटे उद्योग इस नियम का पालन नहीं कर पाते और उनसे निकलने वाला प्रदूषित पानी प्राकृतिक स्त्रोतों से मिलकर प्रदूषण को बढ़ाता है।
प्रदूषण उत्सर्जन के हिसाब से वर्गीकरण
प्रदूषण उत्सर्जन को ध्यान में रखते हुए औद्योगिक इकाइयों को तीन वर्गों में विभाजित किया जाता है। यह हैं लाल (सबसे ज्यादा प्रदूषण उत्सर्जित करने वाली इकाइयां), नारंगी (कम प्रदूषण उत्सर्जित करने वाली इकाइयां) और हरी (सबसे कम प्रदूषण उत्सर्जित करने वाली इकाइयां)। छोटी इकाइयों में तीनों ही प्रकार के उद्योग शामिल हैं।

रविवार, 26 सितंबर 2010

बचाए अपने पर्यावरण को


पर्यावरण, ईश्वर द्वारा प्रदत्त एक अमूल्य उपहार है जो संपूर्ण मानव समाज का एकमात्र महत्वपूर्ण और अभिन्न अंग है। प्रकृति द्वारा प्रदत्त अमूल्य भौतिक तत्वों - पृथ्वी, जल, आकाश, वायु एवं अग्नि से मिलकर पर्यावरण का निर्माण हुआ हैं। यदि मानव समाज प्रकृति के नियमों का भलीभाँति अनुसरण करें तो उसे कभी भी अपनी मूलभूत आवश्यकताओं में कमी नहीं रहेगी। मनुष्य अपनी आकश्यकताओं की पूर्ति के लिए वायु, जल, मिट्टी, पेड-पौधों, जीव-जन्तुओं आदि पर निर्भर हैं और इनका दोहन करता आ रहा हैं।

वर्तमान युग औद्योगिकीकरण और मशीनीकरण का युग है। जहाँ आज हर काम को सुगम और सरल बनाने के लिए मशीनों का उपयोग होने लगा हैं, वहीं पर्यावरण का उल्लंघन भी हो रहा हैं। ना ही पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान दिया जा रहा है और ना ही प्रकृति द्वारा प्रदत्त एक अमूल्य तत्वों का सही मायने में उपयोग किया जा रहा हैं, परिणामस्वरूप प्रकृति कई आपदाओं का शिकार होती जा रही हैं।
वर्तमान समय में मनुष्य औद्योगिकीकरण और नगरीकरण में इस तरह से गुम हो चुका हैं कि वह स्वार्थपूर्ति के लिए प्रकृति का अत्यधिक दोहन करने लगा है और पर्यावरण को असंतुलित बनाए हुए हैं। परिणाम स्वरूप मनुष्य को प्रदूषण, बाढ़, सूखा आदि आपदाओं का सामना करना पड़ता हैं। यदि मनुष्य प्रकृति द्वारा प्रदत्त अमूल्य तत्वों की श्रृंखला का सुरक्षित तरीके से उपभोग करे तो पर्यावरण को संरक्षित रखा जा सकता हैं।
audyogikiikaran और मशीनीकरण के युग में प्रकृति पर अत्याचार होने लगा है, परिणामस्वरूप पर्यावरण में प्रदूषण, अशुद्ध वायु, जल की कमी, बीमारियों की भरमार दिन-प्रतिदिन एक गंभीर चर्चा का विषय बनी हुई हैं, जिससे न तो मनुष्य प्रकृति को बचा पा रहा हैं और न ही खुद को । आज जहाँ मानव समाज विलासितापूर्ण जीवन की चाह लिए हुए प्रकृति का अति दोहन करता जा रहा हैं, वहीं वह अज्ञानतावश स्वयं की जान का भी दुश्मन बन चुका हैं।
पर्यावरण संरक्षण में वृक्षों का सबसे अधिक महत्व हैं। जिस तरह आज औद्योगिकीकरण के युग में वृक्षों की अंधाधुंध कटाई हो रही है, वहाँ आज समाजसेवी संस्थाओं को जन-चेतना को जागृत और प्रोत्साहित करते हुए वृक्षारोपण को एक अनिवार्य गतिविधि बना देना चाहिए, ताकि मनुष्य अपनी विलासिताओं के लोभ में पर्यावरण का दुरूपयोग न कर सकें।
"पर्यावरण और ईश्वर, प्रकृति के वह दो पहलू हैं, जिसकी पूजा और महत्ता के बिना जीवन अधूरा हैं"।

आज मनुष्य आधुनिकता की दौड़ में "पर्यावरण और ईश्वर" दोनों को ही भूलता चला जा रहा हैं। जब मनुष्य पर्यावरण की महत्ता को समझ लेगा, तब वह स्वयं का जीवन सफल बना सकता है और ईश्वर प्रदत्त इस प्रकृति को सुरक्षित बनाए रख सकता हैं।

गुम होते गजराज



संदीपसिंह सिसोदिया

भारत में हाथियों की पूजा होती है. भारतीय संस्कृति में गजराज का अलग स्थान है. लेकिन आज के जमाने में हाथियों को सबसे ज्यादा खतरा अपने पूजकों से ही है. भारत में शिकार और घटते जंगलों से उनकी संख्या घट रही है.

लोभ के शिकार

इनसानों की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने के लिए जंगलों का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल किया जा रहा है. आबादी के जंगलों में सरकने से, जंगली जानवरों के आने जाने के रास्ते पर बढ़ते अतिक्रमण के चलते मनुष्य और जानवरों की मुठभेड़ बढ़ी है. इसका नतीजा अकसर वन्यजीवों के लिए ही नुकसानदेह होता है. कुछ सालों से सरकार को पूर्वोत्तर भारत के पड़ोसी देशों और लोगों से अपील करनी पड़ रही है क‍ि उनके गांवों खेतों में गलती से घुस आए हाथियों की हत्या न की जाए. हर साल बड़ी तादाद में हाथी दांत की तस्करी होती है, जिसके लिए हाथियों को मार दिया जाता है.

टकराव के रास्ते

समस्या यह है कि जंगल में बने हाथियों के रास्तों पर लोगों ने आबादी वाले गांव बसा लिए हैं. इस वजह से हाथी वापस जाने का रास्ता नहीं ढूंढ पा रहे हैं और हिंसक हो रहे हैं. ये हाथी थाइलैंड से भूटान की ओर जाते हैं और भारत का पूर्वोत्तर हिस्सा उनके रास्ते में पड़ता है.

मगर अधिकारियों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में हाथियों की संख्या बढ़ी है. ताजा आंकड़ों के मुताबिक भारत में लगभग 25,000 हाथी हैं. वे अलग अलग रास्तों से जंगलों में घुसने की कोशिश करते हैं. यह समस्या सिर्फ बांग्लादेश, थाइलैंड या भूटान की नहीं, बल्कि भारत के पूर्वोत्तर राज्यों की भी है.

प्रजनन, मौसम की मार से बचने और खाने की तलाश में जंगली जानवर हर साल एक निश्चित अवधि या मौसम में एक इलाके से दूसरे इलाके की ओर जाते हैं. ये हाथी हर साल थाइलैंड से भूटान की तराई में जाते हैं, जिसके बीच पूर्वोत्तर भारत का हिस्सा है. हर साल यह हाथी रास्ते में आने वाले कई गांव उजाड़कर लोगों को मार देते हैं और कई लोग इन मुठभेड़ों में घायल भी हो जाते हैं.

पूर्वोत्तर भारत में जंगली हाथी अच्छी खासी संख्या में पाए जाते हैं और सिर्फ असम में इनकी संख्या 5000 से अधिक बताई जाती है. लेकिन जैसे जैसे असम में आबादी बढ़ती गई, लोगों ने ऐसे इलाकों में पांव पसारने शुरू कर दिए, जो हाथियों के रास्ते थे. नतीजतन हाथी रास्ते में आने वाले गांवों में तबाही मचा देते हैं. इसका भुगतान उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है. हाथियों के उपद्रव से भड़के लोग इन्हें अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानते हैं और कभी गुड़ में जहर रखकर तो कभी शिकारियों को बुलाकर उन्हें मार देते हैं.

संवेदनशील प्राणी

हाथी एक सामाजिक प्राणी है और झुंड बनाकर रहता है. यह प्राणी काफी संवेदनशील होता है. हाथी की याददाश्त काफी तेज मानी जाती है. यहां तक कि अपने झुंड के किसी सदस्य के मारे जाने पर अकसर हाथी गुस्से में आकर तबाही मचा देते हैं. भारतीय हाथी (एलिफास मैक्सिमस इंडिकस) एशियाई हाथी की चार उपजातियों में से एक है. भारत के अलावा हाथी बांग्लादेश, पाकिस्तान, भूटान, कंबोडिया, चीन, लाओस, मलयेशियाई प्रायद्वीप, म्यांमार, नेपाल, थाइलैंड और वियतनाम में भी पाए जाते हैं.

सैटेलाइट से मिली ताजा तस्वीरें बताती हैं कि असम में 1996 से 2008 के बीच जंगल की लगभग चार लाख हेक्टेयर से ज्यादा जमीन पर गांव वालों ने अतिक्रमण कर खेती बाड़ी शुरू कर दी है. इस क्षेत्र में हाथियों के पुराने रास्ते भी हैं. जैसे ही हाथियों के प्रजनन का मौसम शुरू होता है, हाथी इन रास्तों पर अपनी यात्रा शुरू कर देते हैं.

प्रजनन के मौसम में कई बार नर हाथी बेकाबू हो कर सामने आने वाली हर चीज को तहस नहस कर देते हैं. मस्ताने हाथी अपनी ताकत का प्रदर्शन करने के लिए आपस में लड़ाई तो करते ही हैं साथ ही पेड़ पौधों को भी उखाड़ फेंकते हैं. यहां तक कि कई बार ये हाथी गैंडे जैसे बड़े जानवर को भी मार देते हैं.

हाथियों के आबादी वाले इलाके में घुसने से अकसर जानमाल का नुकसान होता है. पर इस घुसपैठ का कारण ढूंढने के लिए पहले ये सोचना होगा कि हाथी हमारे इलाकों में घुस आए हैं या हम उनके इलाके में घुसे हैं.

'कुंकी' करेंगे काबू

असम में जंगली हाथियों के नियंत्रण के लिए 'कुंकी' नाम से जाने जाने वाले पालतू हाथियों की मदद ली जा रही है. असम और पश्चिम बंगाल के बहुत से इलाकों में अकसर उग्र हाथियों के झुंड खेतों, गांवों और लोगों पर हमला कर भारी तबाही मचाते हैं.

विशेषज्ञों ने उग्र हाथियों को पालतू हाथियों के जरिये घेरकर उन्हें रास्ते पर लाने की कोशिश की है. इसके नतीजे भी निकले हैं. सबसे अधिक प्रभावित इलाकों में इस रणनीति को अपनाया गया, वहां हाथियों की हिंसा से मरने वालों की संख्या में आश्चर्यजनक कमी हुई है. इस परियोजना के अधिकारी जंगली हाथियों के झुंड की गतिविधियों पर नजर रखते हैं और उनको पालतू हाथियों से घेर कर गांव से दूर रखते हैं.

इस योजना को वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड से भी मदद मिली है. हाथियों को भगाने के क्रूर पारंपरिक तरीकों जैसे करंट लगाना, फन्दे कसना और बम फोड़ना आदि से यह रणनीति काफी कारगर सिद्ध हुई है. वन्यजीव प्रेमी भी इस पहल से उत्साहित हैं.

सुरक्षित गलियारा

हाथियों की बढ़ती समस्या के बाद भारत में अब कोशिश की जा रही है कि दो जंगलों के बीच एक कॉरिडोर (गलियारा) बना कर उसका संरक्षण किया जा सके. सुरक्षित रास्ते के लिए हाथियों के कॉरिडोर पर तैयार की गई रिपोर्ट पर लगभग सभी बड़े विशेषज्ञों की राय ली गई है. उम्मीद है कि इससे हाथियों को जंगलों में ही रोकना संभव होगा और उनके आबादी वाले इलाकों में घुसने की घटनाओं में कमी आएगी.

भारत में ऐसे 88 गलियारों की पहचान की गई है और उन पर कुछ स्वयंसेवी संस्थाएं सरकार के साथ मिलकर काम कर रही हैं. पर भारत में वन्यजीवों के रहवास के लिए किए जा रहे सभी प्रयासों में एक समस्या मुंह बाए खड़ी रहती है. वह है बढ़ती जनसंख्या की. लगातार बढ़ती जनसंख्या और जंगल पर बढ़ते दबाव ने पिछले कुछ दशकों में हाथियों की समस्या को बढ़ाया है.

इसके लिए देखना होगा कि हाथी दो जंगलों के बीच जिन इलाकों का उपयोग ऐतिहासिक रूप से करते रहे हैं, वहां कितने गांव हैं. आबादी का कितना घनत्व है. दरअसल यही वो इलाके हैं जिन्हें विशेषज्ञ कॉरिडोर कहते हैं. इनके बंद हो जाने के कारण हाथियों ने मानव रहवासी क्षेत्रों में घुसपैठ कर मुसीबतें बढ़ा दी हैं.

भारत के अलग अलग राज्यों के इन गलियारों को अब हाथियों के लिए संरक्षित करने की कोशिश हो रही है. इस योजना से वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया, इंटरनेशनल फंड फॉर एनिमल वेलफेयर, यूएस विश एंड वेलफेयर सर्विस और एशियन नेचर कंजर्वेशन फाउंडेशन जुड़े हैं. इसके अलावा गलियारों के संरक्षणों के लिए केंद्र और राज्य सरकार की भी सहायता ली जा रही है.

उम्मीद की किरण

पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने हाथी को भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग बताते हुए जल्द ही राष्ट्रीय धरोहर प्राणी घोषित किया जाने की बात कही थी. उनका कहना है कि हम जल्द ही हाथी को राष्ट्रीय धरोहर प्राणी घोषित करेंगे क्योंकि वे युगों से हमारी संस्कृति का हिस्सा हैं. इन विशाल प्राणियों का संरक्षण करने के लिए हमें इन्हें बाघों की तरह ही अहमियत देने की जरूरत है. साथ ही उन्होने बताया कि एनटीसीए की तर्ज पर राष्ट्रीय हाथी संरक्षण प्राधिकरण का मार्ग प्रशस्त करने के लिए वन्य जीव (संरक्षण) कानून में भी संशोधन की जरूरत है.

अब उम्मीद है कि इन गलियारों को 'राजकीय गलियारा' घोषित कर दिया जाए और लोगों को जानकारी दी जाए कि इन इलाकों में विकास नहीं किए जा सकते. अब ऐसे इलाकों में लोगों को सिर्फ हाथियों से बचना ही नहीं है, हाथियों को बचाना भी जरूरी है.


शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

जीवनदायिनी नदियों पर खतरे के बादल

- अमितांशु पाठक

छायाएँ, पेड़, मकान, खेत और उगता हुआ सूरज सब जड़ हैं। उसे किसी ने आवाज देकर रोका नहीं। गाँव से पार होते ही उसे माँ की चीख सुनाई दी। उसने इधर-उधर दूर तक देखा। लगा किसी माँ की गोद से उसका बच्चा वक्त का दानव संग लिए चला जा रहा है।

उत्तरप्रदेश के पूर्वांचल को हराभरा रखने वाली एक दर्जन से ज्यादा नदियाँ मृतप्राय हो चुकी हैं। जो बची हैं उनके अस्तित्व पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। गंगा समेत सभी नदियाँ या तो प्रदूषण की मार झेल रही हैं या सूख गई हैं। नदियों के सूखने एवं उनके जल स्तर में हो रही कमी की खबरें जिस तरह से आ रही हैं वे किसी त्रासदी से कम नहीं हैं।

पूर्वी उत्तरप्रदेश के जिलों में जिस तरह से भूजल स्तर गिरता जा रहा है एवं पानी का संकट गंभीर होता जा रहा है, यह चिंता का विषय है। इनमें से ज्यादातर नदियाँ गंगा की सहायक नदियाँ (ट्रिब्यूटरी) हैं। 'जल ही जीवन है' और 'पानी को बर्बादी से बचाएँ' जैसे लुभावने नारे तो सुनने और पढ़ने को मिलते हैं लेकिन कीमती जल को बचाने के प्रति न तो जनता गंभीर है, न ही सरकार।

नहाने, धोने, सिंचाई करने, पूजा-पाठ से लेकर सभी संस्कार आज भी इन्हीं नदियों के किनारे संपन्न होते हैं। इन जीवनदायिनी नदियों के सूख जाने से हमारी क्या दुर्दशा होगी शायद हमें अभी आभास नहीं हो रहा है। पानी का जीवन में क्या महत्व है यह नदियों के किनारे बसने वाले ही बता सकते हैं।
धार्मिक नगरी वाराणसी को ही लें। शहर के मध्य बहने वाली दो पौराणिक नदियों वरुणा एवं असि (अस्सी) के बीच बसी काशी को वाराणसी नाम मिला है। काशी का तो अस्तित्व भी नहीं बचा है। दोनों नदियाँ गंदे नाले के रूप में परिवर्तित हो चुकी हैं। उनके जल से दुर्गंध आती है।
शहर की एक बड़ी आबादी का मल-मूत्र सीधे इन्हीं नदियों से होकर गंगा में सीधे गिर रहा है जो गंगा में प्रदूषण का मुख्य कारण है। नदी के दोनों किनारों पर लोगों ने कब्जा कर बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएँ बना ली हैं। इन नदियों के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए न सरकार गंभीर है और न ही जनता।
वरुणा में जलचर जीवों मछली एवं कछुआ के बारे में सोचना भी कल्पना मात्र है। ऐसा नहीं कि वरुणा की दुर्दशा के बारे में अधिकारियों एवं मंत्रियों को जानकारी नहीं है। जिले के अधिकारी वरुणा की सफाई एवं उसमें गिर रहे नालों को रोकने, नौका विहार एवं वृक्षारोपण जैसी योजना भी बनाते हैं लेकिन ये प्लान कागजों तक ही सीमित हैं। जिस वरुणा एवं असि के योग से काशी का नाम वाराणसी पड़ा उसमें गंदे नाले बेरोकटोक गिर रहे हैं। वरुणा एवं अस्सी में पानी की मात्रा कम कचरा ज्यादा नजर आता है।
जौनपुर में गोमती एवं पीली नदी का यही हाल है। गोमती की हालत खस्ता है। पीली नदी में पानी का नामोनिशान नहीं है। गाजीपुर में मगई नदी सूख चली है। नदी की तलहटी में धूल उड़ रही है। गड़ई, तमशा, विषही, चंद्रप्रभा एवं सोन नदियों की भी हालत बदतर है। गर्मी शुरू होते-होते ये नदियाँ सूख जाती हैं और उनमें केवल धूल उड़ती रहती है। इस बार भी वे नदियाँ सूख चुकी हैं। फैजाबाद में भी विषही एवं मडहा नदियों के पेटे तक लोग खेती करने लगे हैं।
इन नदियों के सूखने का सबसे बड़ा कारण यह है कि इनमें सिल्ट जमते-जमते ये छिछली हो गई हैं। बारिश के कुछ घंटे बाद ही इनका पानी बह जाता है। इस समस्या का अध्ययन करने वाले काशी हिंदू विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की राय है कि जब तक इन नदियों में जमी सिल्ट को हटाकर गहरा नहीं किया जाएगा तब तक गहरे पानी की कल्पना करना बेमानी होगा। इन नदियों पर सैकड़ों गाँवों के लाखों लोगों की जिंदगी की गुजर-बसर आधारित है।
रामचरित मानस में वर्णित तमसा नदी का वजूद भी खतरे में है। आजमगढ़ में साल-दर-साल इसका जलस्तर गिरता जा रहा है। नदी का स्वरूप नाले जैसा हो गया है। मिर्जापुर में बहने वाली खजुरी नदी का भी अस्तित्व मिटने की कगार पर है। इन नदियों के सूखने से आम आदमी और पशुओं की पेयजल की भी समस्या पैदा हो गई है। पहले शहरवासी पानी के संकट से जूझते थे लेकिन अब तो ग्रामीण भी पानी की कमी की मार झेल रहे हैं। प्रतापगढ़ में सई नदी का पानी प्रदूषण से काला पड़ गया है। आदमी तो दूर, जानवर भी इस पानी को नहीं पीते।
नदियों की धारा बनाए रखने एवं इन्हें प्रदूषण से मुक्त करने की बात सरकारी तौर पर समय-समय पर की जाती है तथा तमाम योजनाएँ भी बनती रही हैं लेकिन कोई भी योजना कारगर रूप से नहीं लागू हो पाई। गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के नाम पर सरकार ने अब तक तीन चरणों में अरबों रुपए खर्च किए हैं लेकिन खुद सरकारी आंकड़े बताते हैं कि प्रदूषण कम होने के बजाय और बढ़ा है।
प्रख्यात पर्यावरणविद् महंत वीरभद्र मिश्र के अनुसार इन नदियों के तट पर हर साल वरुणा महोत्सव, तमसा महोत्सव, गोमती महोत्सव जैसे खर्चीले आयोजन कर सरकार अपने कर्तव्य को पूरा मान लेती है पर जब तक इन नदियों को बचाने के लिए कारगर मुहिम को जन आंदोलन का रूप नहीं दिया जाएगा तब तक नदियों को विनाश से बचाना संभव नहीं होगा।
देश की प्रमुख नदियों को जोड़ने की बात सालों से चल रही है लेकिन आज तक इस पर अमल नहीं हुआ। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के पर्यावरणविद् प्रो. वी.डी. त्रिपाठी का कहना है कि नदियों का पर्यावरण संतुलन दिनोदिन बिगड़ रहा है जो मानव जीवन के लिए खतरे का संकेत है। नदियों का सीधा संबंध वायुमंडल से होता है। अत्यधिक जलदोहन एवं मल-जल की मात्रा बढ़ने से नदियों के जल में लेड, क्रोमियम, निकेल, जस्ता आदि धातुओं की मात्रा बढ़ती जाती है जो मानव जीवन के लिए खतरे की घंटी है।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय के ही प्रो. यू.के. चौधरी का मानना है कि नदियाँ हमारी जीवन रेखा हैं। इन्हें हर कीमत पर बचाया जाना चाहिए। नदी का सीधा संबंध पानी, मिट्टी एवं वायु से होता है। अगर इन नदियों का अस्तित्व समाप्त हो गया तो गंगा एवं यमुना के हरे-भरे क्षेत्र को रेगिस्तान में बदलते देर नहीं लगेगी। न केवल पीने के पानी बल्कि खेती के लिए गंभीर समस्या पैदा हो जाएगी। वैज्ञानिकों का मानना है कि नदी के किनारे खेती होनी चाहिए। अगर उनके दोनों किनारों पर कब्जा करके अट्टालिकाएँ खड़ी की जाती रही, जैसा पूर्वी उत्तरप्रदेश की नदियों के तटों पर हो रहा है, तो नदियों की सांसें थम जाएँगी और हमारी जीवनदायिनी नदियाँ इतिहास के पन्नों तक सीमित रह जाएँगी।

जलवायु प्रदूषण फैलाने वाले 10 देशों में भारत भी


पर्यावरण प्रदूषण फैलाने वाले 10 देशों की सूची में भारत को भी शामिल किया गया है। ऑस्ट्रेलिया में तैयार की गई इस रिपोर्ट में भारत को सातवां स्थान दिया गया है जबकि ब्राजील को प्रदूषण के मामले में पहले नंबर पर रखा गया है।

ऑस्ट्रेलिया में एडिलेड विश्वविद्यालय के पयार्वरण संस्थान के प्रोफेसर कोरी ब्रैडशॉ द्वारा तैयार की गई इस रिपोर्ट में भारत को सातवां स्थान दिया गया है जबकि ब्राजील के बाद कार्बन उत्सर्जन करने वाले अग्रणी देशों में अमेरिका एवं चीन शामिल हैं।

नए अध्ययन के मुताबिक सबसे ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाले देशों की सूची में ब्राजील, अमेरिका, चीन, इंडोनेशिया, जापान, मेक्सिको, भारत, रूस, ऑस्ट्रेलिया और पेरु शामिल हैं।

जल प्रदूषण, कार्बन उत्सर्जन और जीव-जंतुओं को खतरा जैसे प्रमुख मुद्दों को शामिल कर इस रिपोर्ट को तैयार किया गया। अध्ययन को विज्ञान की एक पत्रिका में बुधवार को प्रकाशित किया गया था।

ब्रैडशॉ के मुताबिक प्रदूषण फैलाने वाले 10 देशों में अमेरिका और चीन का शामिल होना आश्चर्यजनक बात नहीं है। फिर भी इस बात को लेकर लोग आश्चर्यचकित थे कि सामान्यतौर पर एक गरीब देश ब्राजील ने इस रिपोर्ट में शीर्ष स्थान हासिल किया है।

उन्होंने कहा कि आप जितना ही धनी होंगे पर्यावरण को अधिक नुकसान पहुंचाएंगे। यह सिर्फ मानव का स्वभाव मात्र है।

गुरुवार, 23 सितंबर 2010

सफाई के नाम पर और मैली हुई नर्मदा


हिंदू पुराणों में शिवपुत्री नर्मदा को गंगा से भी पवित्र नदी माना गया है . जनश्रुति है कि पवित्र नदी गंगा वर्ष में एक बार काली गाय के रूप में नर्मदा में स्नान करने आती है और पवित्र होकर श्वेतवर्णी गाय के रूप में फिर से स्वस्थान लौट जाती है. नर्मदा पुराण में कहा गया है कि नर्मदा के दर्शन मात्र से पापियों के पाप नाश हो जाते है. लेकिन आज कठोर सच यह है कि पवित्र नर्मदा नदी मानव जन्य प्रदूषण के कारण अपवित्र गंदी हो गई हैं और अब कहीं-कहीं तो नर्मदा जल स्नान के लायक भी नहीं बचा है. भारत सरकार ने मध्यप्रदेश की नर्मदा, क्षिप्रा, बेतवा और ताप्ती नदियों को प्रदूषण मुक्त करने के कार्यक्रम के लिए 15 करोड़ रू. की विशेष सहायता दी है , लेकिन काम इतनी धीमी गति से और बेतरतीब तरीक़े से हो रहा है कि इन नदियों में जल प्रदूषण की समस्या जस की तस बनी हुई है. नर्मदा भारत की पांच बड़ी नदियों में गिनी जाती है, जो पश्चिम की ओर बहकर अरब सागर में गिरती है. मध्यप्रदेश के अमरकंटक पर्वत की मेकल पर्वत श्रेणी से निकली नर्मदा नदी 1312 किलोमीटर का लंबा स़फर तय करके गुजरात में भड़ौच के समीप अरब सागर की खंबात की खाड़ी में समुद्र से जा मिलती है. नर्मदा मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात राज्यों में बहती हैं लेकिन नदी का 87 प्रतिशत जल प्रवाह मध्यप्रदेश में होने से, इस नदी को मध्यप्रदेश की जीवन रेखा कहा जाता है. आधुनिक विकास प्रक्रिया में मनुष्य ने अपने थोड़े से लाभ के लिए जल , वायु और पृथ्वी के साथ अनुचित छेड़-छाड़ कर इन प्राकृतिक संसाधनों को जो क्षति पहुंचाई है, इसके दुष्प्रभाव मनुष्य ही नहीं बल्कि जड़ चेतन जीव वनस्पतियों को भोगना पड़ रहा है. नर्मदा तट पर बसे गांव, छोटे-बड़े शहरों, छोटे-बड़े औद्योगिक उपक्रमों और रासायनिक खाद और कीटनाशकों के प्रयोग से की जाने वाली खेती के कारण उदगम से सागर विलय तक नर्मदा प्रदूषित हो गई है और नर्मदा तट पर तथा नदी की अपवाह क्षेत्र में वनों की कमी के कारण आज नर्मदा में जल स्तर भी 20 वर्ष पहले की तुलना में घट गया है. ऐसे में नर्मदा को प्रदूषण मुक्त करना समय की सबसे बड़ी ज़रूरत बन गई है, लेकिन मध्यप्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र की सरकारें औद्योगिक और कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए नर्मदा की पवित्रता बहाल करने में ज़्यादा रुचि नहीं ले रहे है.नर्मदा का उदगम स्थल अमरकंटक भी शहर के विस्तार और पर्यटकों के आवागमन के कारण नर्मदा जल प्रदूषण का शिकार हो गया है. इसके बाद, शहडोल , बालाघाट, मण्डला, शिवनी, डिण्डोरी, कटनी, जबल पुर, दामोह, सागर, नरसिंहपुर, छिंदवाड़ा, बैतूल , होशंगाबाद, हरदा, रायसेन, सीहोर, खण्डवा, इन्दौर, देवास, खरगोन, धार, झाबुआ और बड़वानी जिलों से गुजरती हुई नर्मदा महाराष्ट्र और गुजरात की ओर बहती है, लेकिन इन सभी जिलों में नर्मदा को प्रदूषित करने वाले मानव निर्मित सभी कारण मौजूद है. अमलाई पेपर मिल शहडोल, अनेक शहरों के मानव मल और दूषित जल का अपवाह, नर्मदा को प्रदूषित करता है. सरकार ने औद्योगीकरण के लि ए बिना सोचे समझे जो निति बनाई उससे भी नर्मदा जल में प्रदूषण बड़ा है, होशंगाबाद में भारत सरकार के सुरक्षा क़ागज़ कारखाने बड़वानी में शराब कारखानें, से उन पवित्र स्थानों पर नर्मदा जल गंभीर रूप से प्रदूषित हुआ है. गर्मी में अपने उदगम से लेकर, मण्डला, जबल पुर, बरमान घाट, होशंगाबाद, महेश्वर, ओंकारेश्वर, बड़वानी आदि स्थानों पर प्रदूषण विषेषज्ञों ने नर्मदा जल में घातक वेक्टेरिया और विषैले जीवाणु पाए जाने की ओर राज सरकार का ध्यान आकर्षित किया है.
मण्डला में ही नर्मदा जल में घातक प्रदूषण होने लगा है और जबल पुर आते-आते तो प्रदूषण की समस्या और भी गंभीर हो जाती है. गुजरात में औद्योगीकरण ने नर्मदा जल का प्रदूषण स्तर और भी बढ़ाया है. अंकलेश्वर में नर्मदा जल घातक स्तर तक प्रदूषित पाया जाता है. प्रदूषित नर्मदा को पवित्र बनाने और प्रदूषण मुक्त करने के लिए भारत सरकार ने राज्यों को सहायता उपलब्ध कराई है और राज्यों को यह महत्वपूर्ण कार्य उच्च प्राथमिकता से करने की हिदायत दी है, लेकिन मध्यप्रदेश में हिंदूवादी भाजपा सरकार बड़ी सुस्त गति से नर्मदा की पवित्रता बहाल करने के लिए काम कर रही है. नर्मदा के भावनात्मक दोहन और हिन्दु राजनीति के लिए इस्तेमाल पर भाजपा और राज्य सरकार उत्सव, जुलूस और आयोजनों पर तो भारी ख़र्च करती है और उनके आयोजनों से नदी में प्रदूषण फैल जाती है, लेकिन नर्मदा जल की पवित्रता बहाल करने और नर्मदा के किनारे के पर्यावरण को सुधारने के लिए भाजपा और राज्य सरकार के पास न तो कोई सोच है और न तो कोई इच्छा शक्ति है. हाल ही इस वर्ष मई माह में राज्य सरकार के नगरीय प्रशासन विभाग ने नर्मदा के उदगम स्थल अमरकंटक में नदी को प्रदूषण से मुक्त करने के लिए 50 ल ाख रू. की मंजूरी दी है.
सरकार का मानना है कि उदगम स्थल से ही पवित्रता बहाल करके नदी को प्रदूषण मुक्त कराया जा सकता है. जबल पुर, होशंगाबाद और दूसरे नगरों में स्थानीय नगरीय संस्थाओं को नर्मदा नदी को प्रदूषण मुक्त करने और तटवर्ती औद्योगिक उपक्रमों को दूषित जल शोधित करने के निर्देश भी राज्य सरकार द्वारा दिए गए है, लेकिन अभी तक नदी को प्रदूषित करने वाले किसी भी उद्योग के ख़िला़फ सरकार ने कोई कड़ी क़ानूनी कार्यवाही नहीं की है. इससे राज्य सरकार की कमज़ोर इच्छा शक्ति का पता चलता है. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सीहोर जिले में नर्मदा तट के निवासी है और स्वयं को नर्मदा पुत्र बताकर इस क्षेत्र की जनता का भावनात्मक दोहन करते रहते है, लेकिन औद्योगिक विकास के नाम पर मुख्यमंत्री बिना सोचे समझे नए उद्योग लगाने के लिए नर्मदा तट को प्राथमिकता दे रहे है. इससे नर्मदा तट के वनों को क्षति हो रही है और नर्मदा जल के प्रदूषण का नया ख़तरा पैदा हो रहा है.